लाल लकीर

नीरज गुप्ता  | Jan 31, 2016


अपने मित्र ह्रदयेश जोशी को मैं अक्सर कहा करता था कि जितनी बार में बिस्तर में नहीं गया उससे ज्यादा बार तुम बस्तर में हो आए। ह्रदयेश हर बार बस हंस देता। लेकिन मैं कभी अंदाज़ा नहीं लगा पाया कि उस अल्हड़ ठहाके के पीछे रोज़मर्रा की रिपोर्टिंग के अलावा बारीक शोध में लिपटी एक धीर गंभीर कहानी पक रही है.. बरसों से। अब वो कहानी उपन्यास की शक्ल में सामने आई है- एक तजुर्बेकार टीवी पत्रकार और उसके भीतर दुबके संवेदनशील लेखक के बीच की ‘लाल लकीर’ मिटाने। ह्रदयेश की ‘लाल लकीर’ छत्तीसगड़ के बस्तर इलाके में फैली नक्सली समस्या की पृष्ठभूमि पर है। इस मुद्दे पर लिखी ज्यादातर किताबें या तो नक्सलियों की तरफ झुकी नज़र आती हैं या सरकारी नीतियों की तरफ। लेकिन ह्रदयेश की कलम में कमाल का संतुलन है जो पत्रकार के तौर पर उनके खांटीपन का सबूत है। 


ह्रदयेश पुलिस, फोर्स और नक्सलियों के बीच होने वाले रवायती एनकाउंटर या नक्सली हमलों की सरहद से निकलकर आदिवासियों की झोपड़ियों, स्कूलों, सड़कों, अस्पतालों, गांवों, रीति रिवाज़ों, त्यौहारों और हाट बाज़ारों तक टहलते है। वो तेंदु के पत्तों और महुआ के फूलों को सूंघते हैं। वो सलवाजुडूम और नक्सली कैंपों में बेबाक घुसते हैं। ह्रदयेश हर उस जगह पहुंचते हैं जहां आमतौर पर खबरिया चैनलों के कैमरे और शायद अखबारों के खबरनफ़ीस भी नहीं पहुंच पाते। और इन्हीं सब के बीच वो गुंथते हैं सिसकती-मुस्कुराती-सुबकती एक प्रेम कथा। भीमे और रामा की संघर्ष-प्रेम-कथा…।।   
चुनावों या नक्सली हमलों की कवरेज के लिए मैं भी कई बार बस्तर गया हूं। लेकिन ‘लाल लकीर’ से गुज़रते वक्त मैं खुद को नौसिखिया महसूस कर रहा था। ह्रदयेश ने जिस तफ्सीली और ज़िंदा अंदाज़ में ये तानाबाना बुना है उससे लगता है कि उन्होंने बस्तर में बरसों बिताए हैं। कहानी का हर किरदार बेहद सच्चा है और घर घटना बेहद विश्वसनीय।  


कहानी पहले पन्ने से ही आपको अपने साथ चिपका लेती है। आप भीमे को नक्सलियों के बीच फंसा पाकर घबराते हैं.. सुरी की मासूमियत पर मुस्कुराते हैं.. देवा की मौत पर कसमसाते हैं.. इंस्पेक्टर शुक्ला की वहशत पर गुस्साते हैं और भीमे की गोद में बिलखते रामा के साथ रोते हैं। भीमे और रामा के बीच की चुप्पी को सुनते वक्त आप महसूस करेंगे कि संवादों में शब्द भर अहम नहीं होते बल्कि दो शब्दों के बीच की खामोशी ज्यादा अहम होती है।
कुल मिलाकर बस्तर के धधकते जंगलों से गुज़रती ‘लाल लकीर’ वो लाइव यात्रा है जिसे पूरा करने के बाद आप खुद को थका हुआ नहीं बल्कि पहले से ज़्यादा जीवंत महसूस करते हैं।
आखिर में तमाम मित्रों से एक बात- बहुत से लोग ये मानते हैं कि किताब अगर किसी जानपहचान वाले ने लिखी है तो उसकी ज़िम्मेदारी है कि वो दोस्तों को अपनी किताब गिफ्ट करे। ऐसे तमाम वाकिफ़ों को मेरा खुला निमंत्रण है- आप मुझसे संपर्क करें। मैं ‘लाल लकीर’ खरीदकर आपको गिफ्ट करुंगा। सिर्फ इसलिए कि खरीदने के आलस में आप एक बेहतरीन रचना को पढ़ने से महरूम ना रह जाएं।

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