नेस्तनाबूद नेपाल​

नीरज गुप्ता   May 11, 2015
छुट्टी की ऊंघती दोपहर में घनघनाकर बजे फोन को मैने अनमने से उठाया तो दूसरी तरफ से सीधा सवाल था- नेपाल जाओगे..? नेपाल में आए महाभूकंप को करीब तीन घंटे बीत चुके थे और तबाही का आंकड़ा वक्त की रफ्तार से भी तेज़ भाग रहा था। मैने फौरन जवाब दिया- जाऊंगा। इस दफ्तरी बातचीत में ‘कब’और ‘कैसे’ का सवाल बेमानी था। 81 साल के सबसे विध्वंसक भूंकप के झटकों से थरथराता काठमांडू का त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट उस वक्त ठप पड़ा था। लिहाज़ा सड़क से जाना होगा या फ्लाइट से, ये भी तय नहीं था। आलस को बिस्तर पर पटककर मैं ऑफिस पहुंच गया। खैर साहब.. अगले दिन 12 बजकर 55 मिनट पर दिल्ली से काठमांडू जाने वाले स्पाइस जेट के जहाज़ का सफर तय हुआ। 
 
फ्लाइट अगले दिन की थी लेकिन मेरे लिए वक्त गुज़ारना मुश्किल हो रहा था। मैं टीवी से चिपक गया। रिक्टर स्केल पर 7.9 तीव्रता वाले बड़े भूकंप के बाद भी हलके झटके लगातार जारी थे। खबरों की शक्ल में तबाही की तस्वीरें और मौत का मंज़र लम्हा दर लम्हा बदसूरत होता जा रहा था। अगले दिन यानी 26 अप्रैल, 2015 की दोपहर तक मरने वालों की तादाद ढाई हज़ार का आंकड़ा छू रही थी। दिल्ली से उड़ने के बाद दोपहर करीब डेढ़ बजे हमारी फ्लाइट ने लखनऊ शहर का आसमान पार किया तो कॉकपिट से कैप्टन की कांपती आवाज़ गूंजी- नेपाल में दोबारा आए भूकंप के झटकों की वजह से काठमांडू एयरपोर्ट के तमाम ऑप्रेशन्स बंद कर दिए गये हैं। लिहाज़ा हमें वापिस दिल्ली लौटना होगा। दोबारा भूकंप की खौफनाक खबर ने फ्लाइट में मौजूद पत्रकारों की रगों में खून की रफ्तार बढ़ा दी। सब जल्द से जल्द नेपाल पहुंचना चाहते थे लेकिन कोई रास्ता नहीं था। आधुनिक तकनीक के शानदार नमूने यानी हवाई जहाज़ में बैठा मैं सोच रहा था कि अपनी पर आ जाए तो कुदरत इंसान को कितना लाचार बना सकती है।
 
अचानक मेरी नज़र सहमे हुए तीन चेहरों पर पड़ी। ये एक नेपाली परिवार था जिसके तमाम रिश्तेदार काठमांडू और कई दूसरे शहरों में थे। भूकंप के चौबीस घंटे बाद भी उन्हें अपने नातेदारों की की खबर नहीं थी। छन-छन कर आ रही जानकारी के मुताबिक 25 अप्रैल को आए भूकंप ने नेपाल को बर्बाद कर दिया था। ऐसे में रविवार को दोबारा आए भूकंप के बड़े झटके की खबर ने उनकी सांसें रोक दीं। नेपाल में फोन काम नहीं कर रहे थे। उन्होंने मुझे बताया कि वो जल्द से जल्द काठमांडू पहुंचना चाहते हैं लेकिन अभी तो सफर शुरु भी नहीं हो पाया था।
 
दिल्ली एयरपोर्ट पर अफरा-तफरी और बदहवासी के करीब पांच घंटे गुज़ारने के बाद शाम करीब साढ़े सात बजे हमारे जहाज़ ने दोबारा उड़ान भरी। अटकलों के आसमान में घंटों बिताते हुए आखिरकार जहाज़ के पहिये काठमांडू एयरपोर्ट की ज़मीन से टकराए तो रात के दस बज चुके थे। दरवाज़ा खुलते ही हवा का तेज़ झोंका मेरे चेहरे पर झपटा और एक अनजाने खौफ से मैं अंदर तक सिहर गया। एयरपोर्ट पर तेज़ बारिश और अंधेरा था। लेकिन शीशे की खिड़कियों से डिपारचर पर जमा हज़ारों लोगों की भीड़ साफ नज़र आ रही थी। ये वो वक्त था जब हर कोई नेपाल से भागना चाहता था। लेकिन हम बर्बादी के उसी मज़र को कवर करने के लिए वहां रहने आए थे।

Photo Courtsey – Google.com
संकट के क्षण जैसे बेइमानी का लाइसेंस लेकर आते हैं, खासतौर पर टैक्सी वालों के लिए। होटल तक के महज़ सात किलोमीटर के लिए कोई 4000 रूपये मांग रहा था तो कोई 5000। खैर किसी तरह अपने साथीनेपाली कैमरामेन की मदद से हमने 2000 रूपये में एक टैक्सी ली और होटल अन्नपूर्णा पहुंचे। लेकिन ये मुसीबतों का अंत नहीं शुरुआत थी। उस पांच सितारा होटल की लॉबी और लॉन में ज़मीन से लेकर सोफे-कुर्सियों तक लोग बिखरे पड़े थे। मैं ये जानकर अवाक रह गया कि वो तमाम लोग टूरिस्ट थे लेकिन होटल के अपने कमरों को छोड़कर खुले में सो रहे थे। भूकंप के खौफ से ये मेरा पहला करीबी तार्रूफ था। होटल की दीवारों पर दरारों की शक्ल में भूकंप के दस्तखत दिखाई दे रहे थे। स्टाफ नाम की चीज़ लगभग नदारद थी और खाने के नाम पर लॉबी मैनेजर ने कंधे उचका दिए। बदन थकान से टूट रहा था लिहाज़ा भूख और भूकंप दोनों को भगवान भरोसे छोड़कर हम दूसरी मंज़िल पर मौजूद कमरा नंबर 3040 के बिस्तरों पर लुढ़क गए।    
 
अगली सुबह वीडियो जर्नलिस्ट विमल कुमार के साथ मैं होटल से निकला तो शहर की सड़कों पर मरघट का सन्नाटा था। जगह-जगह बिखरे मलबे के बीच सड़ी हुई लाशों की दुर्गंध हवा में तैर रही थी। काठमांडू घाटी के चारों तरफ फैला हिमालय पर्वत किसी बेरहम हत्यारे सरीखा लग रहा था। कोई स्थानीय मदद मौजूद नहीं थी और फोन-इंटरनेट काम नहीं कर रहे थे। कुछ देर भटकने के बाद मैं इत्तेफाकन ही बेघर हो चुके कुछ लोगों के बीच पहुंच गया। ये नेपाल निर्वाचन आयोग के पार्क में बना एक राहत कैंप था। प्लास्टिक की पन्नियों और बांस की डंडियों के कामचलाऊ तंबुओं के नीचे लोगों ने अपने रैनबसेरे बनाए थे। मजबूरी और लाचारी इंसानी चेहरों की शक्ल में चारों तरफ बिखरी पड़ी थी। बच्चे, बूढ़े महिलाएं, देशी, विदेशी सबकी एक सी हालत थी- बदतर। खाना-पीना, ओढ़ना बिछाना तो छोड़िये शौचालय जैसी बुनियादी ज़रूरतों को तरसते वो लोग अपनी बदनसीबी पर रो रहे थे। खास बात ये कि उन बेघरों में बहुत से वो भी थे जिनके घर सुरक्षित हैं लेकिन भूकंप के फिर से आने का खौफ उन्हें खुले आसमान के नीचे ही रहने को मजबूर कर रहा था। यहां तक कि कांतिपुर टीवी जैसा नेपाल का बड़ा खबरिया चैनल सड़क पर तंबू लगाकर लोगों तक भूंकप की खबरें पहुंचा रहा था।

दुनिया की सबसे ऊँची चौदह पहाड़ी चोटियों में से आठ नेपाल में हैं और उन्हीं में एक है माऊंट एवरेस्ट। हिमालय की गोद में बसे इस प्यारे से देश में हर साल क़रीब पांच लाख विदेशी पर्यटक आते हैं जिनमें से आधों का मकसद सिर्फ ट्रेकिंग यानी पर्वतारोहण होता है। भूकंप की वजह से सब ठप था और विदेशी पर्वतारोहियों की अच्छी खासी तादाद राहत शिविरों में टिके रहने को मजबूर थी। खास मकसद से आनेवाले ये टूरिस्ट अपने साथ टेंट और खानेपीने का सामान लेकर चलते हैं लिहाज़ा उनकी हालत कैंप में मौजूद बाकि लोगों से बेहतर थी। मेरी मुलाकात चैक गणराज्य से आई विदेशियों की एक टोली से हुई। मैने जब उन्हें बताया कि मैं उनके देश जा चुका हूं तो उन्होंने यकीन करने में खासा वक्त लिया। वहां मुझे एक अनोखी चीज़ नज़र आई। बच्चों के बीच इधर-उधर दौड़ते पालतू कुत्ते। उनमें से भी ज्यादातर सफेद झबरीले पॉमेरियन। बाद में मैने गौर किया कि नेपाल के लोग पालतू कुत्तें के खासे शौकीन हैं और पॉमेरियन पंसदीदा ब्रीड है।
 
कैंप से निकलकर मैने भूंकप के एक और शिकार इलाके भक्तपुर की टैक्सी पकड़ी। काठमांडू के पूर्वी कोने पर 13 किलोमीटर की दूर पर बसा भक्तपुर नेपाल की सांस्कृतिक राजधानी और पर्यटकों की जान कहलाता है। द् लॉयन गेट, गोल्डन गेट, पचपन खिड़कियों वाला दिव्य महल, प्राचीन शिव मंदिर और ना जाने क्या क्या। सैंकड़ों साल पहले लकड़ी और पत्थरों पर उकेरी गई कलाकृतियों में मूर्तिकारों ने जैसे अपने दिल निकालकर रख दिए हैं। इसकी ऐतिहासिक विरासत के चलते ही यूनेस्को ने 1978 में इसे वर्ल्ड हैरिटेज साइट का दर्जा दिया था। दस साल पहले भारत-पाकिस्तान के पत्रकारों की एक कांफ्रेंस में शिरकत के दौरान मैं भक्तपुर गया था। वही धुंधली तस्वीरें मेरे ज़हन में तैर रही थीं। लेकिन रास्ते का मंज़र मज़िल की सूरत का अंदाज़ा भी दे रहा था। भक्तपुर पहुंचकर मैं टैक्सी से उतरा तो मेरा दिल बैठ गया। पारंपरिक वास्तुकला की शक्ल में कल्पनाओं को भी पीछे छोड़ देने वाली वहां की खूबसूरती कुदरत के कहर से ज़मीदोज़ चुकी थी। ये भूकंप की त्रासदी का वो पन्ना है जो शायद कभी अपनी पुरानी सूरत में वापिस नहीं लौट पाएगा।
 
काम से फुरसत मिली तो पेट की याद आई। लेकिन सोमवार की शाम तक हालत में कोई सुधार नहीं हुआ था। तमाम दुकानों, रेस्तरां के शटर गिरे हुए थे। बड़ी मन्नतों से एक ढाबा नज़र आया। हम लोग भिखारियों सी सूरत लेकर उसके पास धमक गए। भूख इस कदर थी कि खाने का स्वाद तक मुझे याद नहीं लेकिन हां.. चावल, दाल और आलू सब्ज़ी की हर प्लेट का दाम आठ सौ रुपये था।
 
मेरे साथी पत्रकारों का एक बड़ा धड़ा एयर फोर्स और एनडीआरफ के हेलिकॉप्टरों में दूर दराज़ इलाकों के चक्कर काट रहा था। लिहाज़ा मैने हवा में उड़ने के बजाए ज़मीन पर ही टिके रहने का मन बना लिया। भारत समेत 35 देशों की बचाव टीमें और दर्जनों देशों के सैंकड़ों पत्रकार होटलों से लेकर सड़कों पर काबिज़ थे। वाई-फाई का सिग्नल मिल जाए तो चेहरे ऐसे खिलते थे जैसे समंदर में भटके जहाज़ को कोई वॉच टावर दिख गया हो। काठमांडु शहर में एक हज़ार के करीब लोगों की मौत हो चुकी थी। हर मोड़ पर मलबे के ढेर, राहत-बचाव के कामों में जुटे जवान और मुंह पर मास्क लगाए आम लोग नज़र आते थे। इसके अलावा सिंधुपलचौक, नुवाकोट, धादिंग, भक्तपुर, गोरखा, कावरे, ललितपुर और रासुवा जैसे कई ज़िलों में हज़ारों लोग काल का ग्रास बन चुके थे। मेरे लिए दिक्कत ये थी कि इन तमाम इलाकों में कोई टैक्सी जाने को तैयार नहीं थी और उसके अलावा कोई ज़रिया नहीं था। आजकल बीबीसी में काम कर रही मेरी एक पुरानी सहयोगी ने मुझे सांखू गांव जाने की सलाह दी।
 
एक टैक्सी ड्राइवर के हाथ पैर जोड़कर मैने उसे सांखू जाने को तैयार किया। ये गांव काठमांडु से 17-18 किलोमीटर ही रहा होगा। डेढ़ घंटे के सफर के बाद हम वहां पहुंचे तो मेरा दिमाग झनझना गया। लग रहा था कि मैं भूंकप का शिकार हुए किसी गांव में नहीं बल्कि 1974 में आई हॉलिवुड मूवी Earthquake के सेट पर खड़ा हूं। हर तरफ तबाही के निशान और गिरे हुए मकान। संकरी गलियों वाले उस गांव के घरों पर जैसे किसी ने बाकायदा रोड रोलर चला दिया हो। मैं आगे बढ़ ही रहा था कि अचानक सड़े हुए इंसानी जिस्म की तेज़ दुर्गंध ने मेरा कलेजा मुंह को ला दिया। नेपाल आर्मी और चीन से आई बचाव टीमें मलबे के एक ढेर में कुछ ढूंढ रही थीं। नाक पर रूमाल बांधकर मैं ज़रा करीब पहुंचा तो एक गावंवाले ने मुझे बताया कि यहां एक 10 साल की बच्ची समेत चार लोगों के दबे होने की आशंका है। सांखू में 25 लोगों की मौत हो चुकी थी और 250 से ज्यादा लापता थे। लेकिन प्रलय का वो आलम उम्मीद की हर किरण को हर गुज़रते पल के साथ झीना कर रहा था।  
 
भूकंप के पांचवे दिन यानी 29 अप्रैल तक काठमांडु की सड़कों पर ज़िंदगी पटरी पर लौटने लगी थी। बचाव के कदम अब राहत और पुनर्वास की तरफ सरकने लगे थे। उसी दिन मैं श्री श्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग की राहत टीम के साथ काठमांडु से 70 किलोमीटर दूर नुवाकोट ज़िले के थानापति गांव में पहुंचा। एक पहाड़ की चोटी पर बसे उस गांव तक पहुंचने के लिए हमें करीब 5 किलोमीटर की बेहद थका देने वाली खड़ी चढ़ाई पैदल चढ़नी पड़ी। लेकिन नीले आसमान और रूई के गोलों जैसे सफेद बादलों के बीच उस मनमोहक गांव में पहुंचने पर ये खुलासा हुआ कि शहरों में लौटती चहलपहल दरअसल आधा सच है। भूकंप के 6 दिन बाद भी उस गांव में सरकार नाम की कोई चीज़ नहीं पहुंची। कुदरत के कहर से घायल लोग खुद ही अपने गिरे हुए आशियानों को फिर से खड़ा करने की लड़खड़ाती कोशिशें कर रहे थे।
 
शनिवार यानी 2 मई की खबरें नेपाल में डटे भारतीय पत्रकारों के लिए भूकंप का एक और झटका लेकर आईं। खबर ये कि ट्विटर पर #GoHomeIndianMedia का हैशटैग बड़े ज़ोरों पर ट्रेंड कर रहा है। आरोप था कि भारतीय पत्रकार इकतरफा रिपोर्टिंग करते हुए त्रासदी का सही चित्रण करने के बजाए अपनी सेना और सरकार का काम बढाचढ़ा कर पेश कर रहे हैं। हालांकि बाद में दिल्ली में मिले नेपाल के राजदूत दीप कुमार उपाध्याय ने मुझे कहा कि वो हैशटैग नेपाली लोगों को भावनाएं नहीं बल्कि कुछेक ट्विटरबाज़ों का खास डिज़ाइन था।
 
फिलहाल दुनिया भर से आई राहत और बचाव टीमों के लौटने के बाद अपने दूर दराज़ इलाकों को दोबारा बसाने की जंग एशिया के इस दूसरे सबसे गरीब देश को अकेले लड़नी है। आठ दशक के भीषण भूकंप सेनेपाल में 7500 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। कुल आबादी का एक तिहाई यानी करीब 3 करोड़ लोग किसी ना किसी रूप में इसका शिकार हुए हैं। नेपाल को दोबारा संवारने में करीब 10 अरब डॉलर यानी 1000 अरब नेपाली रूपये का खर्च आएगा। ये रकम नेपाल की कुल अर्थव्यवस्था का आधा है।
 
वैसे दिलचस्प बात है कि भूकंप के वक्त काठमांडू शहर में ताश के पत्तों की तरह ढहती इमारतों के बीच भी बागमति नदी के किनारे पर बना मशहूर पशुपतिनाथ मंदिर अपनी जगह पर अडिग खड़ा रहा। हम दुआ करते हैं कि नेस्तनाबूद नेपाल को बसाने में लगी इंसानी कोशिशों को भगवान पशुपतिनाथ का आशीर्वाद भी मिलेगा और हिमालय की तलहटी में बसा ये खूबसूरत देश, देर-सबेर ही सही, अपने मेहमानों का इस्तगबाल करने के लिए दोबारा उठ खड़ा होगा। 

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